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“मैं खुद को ढूँढने निकला हूँ”

दराजों को खंगाला मैंने
अखबारों को निकाला मैंने
गद्दे भी उलट के देख लिए
पन्ने भी पलट के देख लिए
झोला फाड़ के देख लिया
जेब झाड़ के देख लिया
हर रिश्ता जोड़ के देख लिया
शीशा भी तोड़ के देख लिया
हर चीज़ में खुद का साया है
पर खुद को कहीं न पाया है
एक पता पूंछने निकला हूँ
मैं खुद को ढूँढने निकला हूँ

Budhha

 

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मेरे सफलता के मायने

ना इंतज़ार है किसी आख़िरी पल का

जिसमे आंकलन हो पिछले सारे पलो का

ना हो हाथ में कोई रिपोर्ट कार्ड हो

जिसमे गणित हो मेरे पास फेल का

और न ही कुछ इतना बड़ा करना है

कि अवकाश हो स्कूल का

कुछ चंद ख्वाहिशें है,

जैसे

कि पहुँचू जब घर शाम को

तो खाने में

मक्के की रोटी और बैगन का भरता हो

कि उठूँ जब सवेरे

तो आँखों पे सूरज की पहली किरन

और पैरो पे ओस की बूँदे हो

जब बैठक हो किसी नुक्कड़ पे

हाथ में चाय और चार दोस्त हो

और एक कहानी हो

जिसे में सुनाने को और वो सुनने को बेताब हो

बस

यादों की दुकान में

अनुभवों किताब हो

!!

“I am so sorry i will speak in Hindi”

जब से मानव जंगल छोड़कर, सभ्यता की सीढ़ी चढ़ने लगा, भाषा उसके जीवन का एक अभिन्न अंग बन गयी। फिर वो धीरे धीरे अपने आप में ज़रुरत के अनुरूप स्तर-दर-स्तर विकसित भी होती रही। शुरुआती दौर से भाषा, अभिव्यक्ति और संवाद स्थापित करने का शसक्त औजार रही है। इसका कभी भी हमारे जीवन स्तर या किसी भी प्रकार की तुलना करने में कभी प्रयोग नहीं हुआ। पर पिछले कुछ दशको से इसका उपयोग लगातार तुलनात्मक कार्यो के लिए लिया गया।

मध्यप्रदेश के एक छोटे से शहर “सागर” से अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुझे मौका मिला मुंबई के इस बड़े से संस्थान (TISS ) से पोस्ट-ग्रेडुएशन करने का। चूँकि हमेशा से ही हिंदी भाषी माहौल में पला और बड़ा हुआ इसलिए अपनी अंग्रेजी से ज्यादा बन नहीं पायी। पहली बार इतने सारे लोंगो को एक साथ अंग्रेजी में बात करते सुना था वो भी फर्राटेदार स्पीड में, लगा ये इतने सारे अंग्रेजी बोलने वाले लोग कब चाँद से उतर आये, हमें तो कभी पता नहीं चला। हद तो तब हुई जब देखा की लोग क्लास के बाद भी आपस में भी इंग्लिश में बात करते है। ये सब मेरे लिए बिलकुल नया था। और अजनबी सा भी।

धीरे धीरे दिन बीते, क्लासेस चलने लगी, मेरी क्लास में बेंच भी लास्ट होने लगी। इंग्लिश समझने में तो ठीक ठाक समझ लेता था पर बोलना जैसे गंगा को धरती पर बुलाना था, कभी हो ही नहीं पाया। धीरे धीरे मैं अपने में सीमित होने लगा। मेरी आइडेंटिटी, मेरा वज़ूद, मैं धीरे धीरे छोड़ने लगा। इसी के साथ छोड़ने लगा मैं अपनी आजादी, अपनी freedom. वो आजादी जिसके लिए हमने वर्षो संघर्ष किया, लड़ाइयाँ लड़ी। इसी के साथ धीरे से मुझमें हीन भावना (inferiority complex) भी आने लगी। जिससे में अपने आपको बहुत कम मापने लगा। और फिर शुरू हुई मेरी मुझसे ही एक जंग। जो मेरे अंदर की थी, मेरे वज़ूद से थी। ये सब मुझे उस जाति व्यवस्था (cast system) जैसा लगा जिसमें मुझसे मेरी जाति पूछें बिना ही अलग कर दिया गया। और जैसे मुझसे मना किया गया हो की मैं उस सार्वजनिक घड़े को छू नहीं सकता जिसे सिर्फ ऊंची जाति के लोगों ही इज़ाज़त है। ये मौजूदा माहौल मुझसे चीख चीख के कह रहा था, अंग्रेजी बोलने वाले इंटेलिजेंट होते है, हिंदी बोलने वाले down market होते है।

महीनो चली इस जंग से मानसिक संतुलन में काफी उतार चढ़ाव आये। और करीब तीन महीने लगे मुझे खुद को ये समझाने में कि it is ok if not to speak in english, तब मुझे ये एहसास हुआ अंग्रेजी न सिर्फ एक भाषा है, बल्कि lifestyle है, एक सभ्यता है। और अगर आप इस सभ्यता से भिन्न होते है तो आप तुच्छ होते है, आप victim होते है। भाषा ना सिर्फ हमारे संवाद का जरिया होती है बल्कि इससे भी अधिक ये हमारी पहचान, हमारी आजादी होती है। और अगर किसी की पहचान ही नहीं होती है तो कुछ नहीं होता है। ऐसी बहुत सी अभिव्यक्ति है जिनको भाषा की ज़रुरत नहीं होती है। जैसे हम कभी अंग्रेजी में रोते नहीं है, खाते नहीं हैं सोते नहीं हैं। भाषा कभी भी तुलना करने का जरिया तो नहीं हो सकता। हमारी असली भाषा वो होती है जिसमे हमने लोरी सुनी हो, जिसमे हम सोचते और सपने देखते है या जिसमे हम गाली देते है। मुझे लगता है उर्दू प्यार की भाषा है, हिंदी दिल की और अंग्रेजी मार्केटिंग की।

“जैसे लोग होते है वैसा हो जाता हूँ”

मैं, जैसे लोग होते है वैसा हो जाता हूँ

बिखरे होते है तो बिखर जाता हूँ

निखरे होते है तो निखर जाता हूँ

अपना होना दुसरो पर नहीं जताता हूँ

जैसे भी होते है उनका हो जाता हूँ

मैं जैसे लोग होते है वैसा हो जाता हूँ

 

अकेले किसी मज़िल पे जाकर क्या हासिल होगा

कोई नहीं मिलेगा जश्न को बाँटने के लिए

टूटे  सितारों सा खो जाता हूँ

मैं जैसे लोग होते है वैसा हो जाता हूँ

 

खुद को सब में डुबोते जाता हूँ

सब को खुद में डुबोते जाता हूँ

हवा का झोंका हूँ हवाओं में खो जाता हूँ

अकेला होता हूँ तो खुद से हो जाता हूँ

मैं जैसे लोग होते है वैसा हो जाता हूँ

 

आँख बंद करूँ तो पूरा हो जाता हूँ

खोलू तो अधूरा हो जाता हूँ

मुलाकातों से मैं बनता जाता हूँ

इंसानो से मिलते मिलते

मैं भी इंसान होता जाता हूँ

सन्दर्भ – कवीश (ज़ुबान)